श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रद्धाय वाक्यं देवर्षेर्हर्षवेगेन धर्षितः।

वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम्॥ ३८

śraddhāya vākyaṃ devarṣerharṣavegena dharṣitaḥ|

vārtāharturatiprīto hāraṃ prādānmahādhanam|| 38

अर्थ

परन्तु फिर उन्हें देवर्षि नारदकी बात याद आ गयी। इससे उनका इस बातमें विश्वास हुआ और वे आनन्दके वेगसे अधीर हो उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्‍न होकर यह समाचार लानेवालेको एक बहुमूल्य हार दिया॥ ३८॥✎ 1946

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1946 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बिभूषित → विभूषित

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