प्रभुकी चरणसेवासे संकल्पित वस्तु प्राप्त हो जानेके कारण यद्यपि ध्रुवजीका संकल्प तो निवृत्त हो गया, किन्तु उनका चित्त विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। फिर वे अपने नगरको लौट गये॥ २७॥
सोऽपि संकल्पजं विष्णोः पादसेवोपसादितम्।
प्राप्य संकल्पनिर्वाणं नातिप्रीतोऽभ्यगात्पुरम्॥ २७
प्रभुकी चरणसेवासे संकल्पित वस्तु प्राप्त हो जानेके कारण यद्यपि ध्रुवजीका संकल्प तो निवृत्त हो गया, किन्तु उनका चित्त विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। फिर वे अपने नगरको लौट गये॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 456) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/9/27/