श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति

विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात्।

तद्ब्रह्म विश्‍वभवमेकमनन्तमाद्य-

मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये॥ १६

yasmin viruddhagatayo hyaniśaṃ patanti

vidyādayo vividhaśaktaya ānupūrvyāt|

tadbrahma viśvabhavamekamanantamādya-

mānandamātramavikāramahaṃ prapadye|| 16

अर्थ

आपसे ही विद्या-अविद्या आदि विरुद्ध गतियोंवाली अनेकों शक्तियाँ धारावाहिक रूपसे निरन्तर प्रकट होती रहती हैं। आप जगत‍्के कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त, आनन्दमय निर्विकार ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपकी शरण हूँ॥ १६॥✎ 2003

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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