श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा

कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः।

यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या

द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से॥ १५

tvaṃ nityamuktapariśuddhavibuddha ātmā

kūṭastha ādipuruṣo bhagavāṃstryadhīśaḥ|

yadbuddhyavasthitimakhaṇḍitayā svadṛṣṭyā

draṣṭā sthitāvadhimakho vyatirikta āsse|| 15

अर्थ

प्रभो! आप अपनी अखण्ड चिन्मयी दृष्टिसे बुद्धिकी सभी अवस्थाओंके साक्षी हैं तथा नित्यमुक्त शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदि-पुरुष, षडैश्‍वर्य-सम्पन्‍न एवं तीनों गुणोंके अधीश्‍वर हैं। आप जीवसे सर्वथा भिन्‍न हैं तथा संसारकी स्थितिके लिये यज्ञाधिष्ठाता विष्णुरूपसे विराजमान हैं॥ १५॥✎ 2003

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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