श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एवं भगवतो रूपं सुभद्रं ध्यायतो मनः।

निर्वृत्या परया तूर्णं सम्पन्‍नं न निवर्तते॥ ५२

evaṃ bhagavato rūpaṃ subhadraṃ dhyāyato manaḥ|

nirvṛtyā parayā tūrṇaṃ sampannaṃ na nivartate|| 52

अर्थ

भगवान्‌की मंगलमयी मूर्तिका इस प्रकार निरन्तर ध्यान करनेसे मन शीघ्र ही परमानन्दमें डूबकर तल्लीन हो जाता है और फिर वहाँसे लौटता नहीं॥ ५२॥✎ 369

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #369 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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