श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम्।

नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम्॥ ५१

smayamānamabhidhyāyetsānurāgāvalokanam|

niyatenaikabhūtena manasā varadarṣabham|| 51

अर्थ

इस प्रकार धारणा करते-करते जब चित्त स्थिर और एकाग्र हो जाय तब उन वरदायक प्रभुका मन-ही-मन इस प्रकार ध्यान करे कि वे मेरी ओर अनुरागभरी दृष्टिसे निहारते हुए मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं॥ ५१॥✎ 369

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #369 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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