निष्पाप विदुरजी! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तुम्हें प्रलयका कारणरूप यह अधर्मका वंश सुनाया। यह अधर्मका त्याग कराकर पुण्य-सम्पादनमें हेतु बनता है; अतएव इसका वर्णन तीन बार सुनकर मनुष्य अपने मनकी मलिनता दूर कर देता है॥ ५॥✎ 13211322
संग्रहेण मयाऽऽख्यातः प्रतिसर्गस्तवानघ।
त्रिःश्रुत्वैतत्पुमान् पुण्यं विधुनोत्यात्मनो मलम्॥ ५
निष्पाप विदुरजी! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तुम्हें प्रलयका कारणरूप यह अधर्मका वंश सुनाया। यह अधर्मका त्याग कराकर पुण्य-सम्पादनमें हेतु बनता है; अतएव इसका वर्णन तीन बार सुनकर मनुष्य अपने मनकी मलिनता दूर कर देता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 443) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1321 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1322 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति