श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के इस प्रकार आज्ञा देनेपर प्रजापतियोंके नायक दक्षने उनका त्रिकपाल-यज्ञके द्वारा पूजन करके फिर अंगभूत और प्रधान दोनों प्रकारके यज्ञोंसे अन्य सब देवताओंका अर्चन किया॥ ५५॥
एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम्।
अर्चित्वा क्रतुना स्वेन देवानुभयतोऽयजत्॥ ५५
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के इस प्रकार आज्ञा देनेपर प्रजापतियोंके नायक दक्षने उनका त्रिकपाल-यज्ञके द्वारा पूजन करके फिर अंगभूत और प्रधान दोनों प्रकारके यज्ञोंसे अन्य सब देवताओंका अर्चन किया॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 442) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/55/