श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि।

ब्र२ह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति॥ ५२

tasmin brahmaṇyadvitīye kevale paramātmani|

brahmarudrau ca bhūtāni bhedenājño'nupaśyati|| 52

अर्थ

ऐसा जो भेदरहित विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप मैं हूँ, उसीमें अज्ञानी पुरुष ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य समस्त जीवोंको विभिन्‍न रूपसे देखता है॥ ५२॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—देहात्मबुद्धिर्भूतानि।

    (मुद्रित पृष्ठ 441)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें