विप्रवर! अपनी त्रिगुणात्मिका मायाको स्वीकार करके मैं ही जगत्की रचना, पालन और संहार करता रहता हूँ और मैंने ही उन कर्मोंके अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर—ये नाम धारण किये हैं॥ ५१॥
आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज।
सृजन् रक्षन् हरन् विश्वं दध्रे संज्ञां क्रियोचिताम्॥ ५१
विप्रवर! अपनी त्रिगुणात्मिका मायाको स्वीकार करके मैं ही जगत्की रचना, पालन और संहार करता रहता हूँ और मैंने ही उन कर्मोंके अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर—ये नाम धारण किये हैं॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 441) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/51/