भगवान् रुद्र परम स्वतन्त्र हैं, उनके तत्त्व और शक्ति-सामर्थ्यको न तो कोई ऋषि-मुनि, देवता और यज्ञस्वरूप देवराज इन्द्र ही जानते हैं और न स्वयं मैं ही जानता हूँ; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या हे। ऐसी अवस्थामें उन्हें शान्त करनेका उपाय कौन कर सकता है॥ ७॥✎ 1918
नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये
ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम्।
विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा
य स्यात्मतन्त्रस्य क उपायं विधित्सेत्॥ ७
भगवान् रुद्र परम स्वतन्त्र हैं, उनके तत्त्व और शक्ति-सामर्थ्यको न तो कोई ऋषि-मुनि, देवता और यज्ञस्वरूप देवराज इन्द्र ही जानते हैं और न स्वयं मैं ही जानता हूँ; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या हे। ऐसी अवस्थामें उन्हें शान्त करनेका उपाय कौन कर सकता है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 428) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप