श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये

ये देहभाजो मुनयश्‍च तत्त्वम्।

विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा

य स्यात्मतन्त्रस्य क उपायं विधित्सेत्॥ ७

nāhaṃ na yajño na ca yūyamanye

ye dehabhājo munayaśca tattvam|

viduḥ pramāṇaṃ balavīryayorvā

ya syātmatantrasya ka upāyaṃ vidhitset|| 7

अर्थ

भगवान् रुद्र परम स्वतन्त्र हैं, उनके तत्त्व और शक्ति-सामर्थ्यको न तो कोई ऋषि-मुनि, देवता और यज्ञस्वरूप देवराज इन्द्र ही जानते हैं और न स्वयं मैं ही जानता हूँ; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या हे। ऐसी अवस्थामें उन्हें शान्त करनेका उपाय कौन कर सकता है॥ ७॥✎ 1918

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें