वह वन जंगली हाथियोंके शरीरकी रगड़ लगनेसे घिसे हुए हरिचन्दन वृक्षोंका स्पर्श करके चलनेवाली सुगन्धित वायुके द्वारा यक्षपत्नियोंके मनको विशेषरूपसे मथे डालता था॥ ३०॥
वनकुञ्जरसंघृष्टहरिचन्दनवायुना ।
अधिपुण्यजनस्त्रीणां मुहुरुन्मथयन्मनः॥ ३०
वह वन जंगली हाथियोंके शरीरकी रगड़ लगनेसे घिसे हुए हरिचन्दन वृक्षोंका स्पर्श करके चलनेवाली सुगन्धित वायुके द्वारा यक्षपत्नियोंके मनको विशेषरूपसे मथे डालता था॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/6/30/