॥ श्रीहरिः ॥
रक्तकण्ठखगानीकस्वरमण्डितषट्पदम्।
कलहंसकुलप्रेष्ठं खरदण्डजलाशयम्॥ २९
raktakaṇṭhakhagānīkasvaramaṇḍitaṣaṭpadam|
kalahaṃsakulapreṣṭhaṃ kharadaṇḍajalāśayam|| 29
अर्थ
उसमें कोकिल आदि पक्षियोंका कलरव और भौंरोंका गुंजार हो रहा था तथा राजहंसोंके परमप्रिय कमलकुसुमोंसे सुशोभित अनेकों सरोवर थे॥ २९॥
रक्तकण्ठखगानीकस्वरमण्डितषट्पदम्।
कलहंसकुलप्रेष्ठं खरदण्डजलाशयम्॥ २९
उसमें कोकिल आदि पक्षियोंका कलरव और भौंरोंका गुंजार हो रहा था तथा राजहंसोंके परमप्रिय कमलकुसुमोंसे सुशोभित अनेकों सरोवर थे॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/29/