श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ययोस्तत्स्नानविभ्रष्टनवकुङ्कुमपिंजरम् ।

वितृषोऽपि पिबन्त्यम्भः पाययन्तो गजा गजीः॥ २६

yayostatsnānavibhraṣṭanavakuṅkumapiṃjaram |

vitṛṣo'pi pibantyambhaḥ pāyayanto gajā gajīḥ|| 26

अर्थ

स्नानके समय उनका तुरंतका लगाया हुआ कुचकुंकुम धुल जानेसे जल पीला हो जाता है। उस कुंकुममिश्रित जलको हाथी प्यास न होनेपर भी गन्धके लोभसे स्वयं पीते और अपनी हथिनियोंको पिलाते हैं॥ २६॥✎ 1976

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