स्नानके समय उनका तुरंतका लगाया हुआ कुचकुंकुम धुल जानेसे जल पीला हो जाता है। उस कुंकुममिश्रित जलको हाथी प्यास न होनेपर भी गन्धके लोभसे स्वयं पीते और अपनी हथिनियोंको पिलाते हैं॥ २६॥✎ 1976
ययोस्तत्स्नानविभ्रष्टनवकुङ्कुमपिंजरम् ।
वितृषोऽपि पिबन्त्यम्भः पाययन्तो गजा गजीः॥ २६
स्नानके समय उनका तुरंतका लगाया हुआ कुचकुंकुम धुल जानेसे जल पीला हो जाता है। उस कुंकुममिश्रित जलको हाथी प्यास न होनेपर भी गन्धके लोभसे स्वयं पीते और अपनी हथिनियोंको पिलाते हैं॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 430) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1976 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उसमें → उनमें