श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ययोः सुरस्त्रियः क्षत्तरवरुह्य स्वधिष्ण्यतः।

क्रीडन्ति पुंसः सिंचन्त्यो विगाह्य रतिक४र्शिताः॥ २५

yayoḥ surastriyaḥ kṣattaravaruhya svadhiṣṇyataḥ|

krīḍanti puṃsaḥ siṃcantyo vigāhya ratikarśitāḥ|| 25

अर्थ

विदुरजी! उन नदियोंमें रतिविलाससे थकी हुई देवांगनाएँ अपने-अपने निवासस्थानसे आकर जलक्रीडा करती हैं और उनमें प्रवेशकर अपने प्रियतमोंपर जल उलीचती हैं॥ २५॥✎ 1976

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—रतितर्षिताः।

    (मुद्रित पृष्ठ 430)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1976 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उसमें → उनमें

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