श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महादेवजीने जब देवर्षि नारदके मुखसे सुना कि अपने पिता दक्षसे अपमानित होनेके कारण देवी सतीने प्राण त्याग दिये हैं और उसकी यज्ञवेदीसे प्रकट हुए ऋभुओंने उनके पार्षदोंकी सेनाको मारकर भगा दिया है, तब उन्हें बड़ा ही क्रोध हुआ॥ १॥✎ 1317
भवो भवान्या निधनं प्रजापते-
रसत्कृताया अवगम्य नारदात्।
स्वपार्षदसैन्यं च तदध्वरर्भुभि-
र्विद्रावितं क्रोधमपारमादधे॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महादेवजीने जब देवर्षि नारदके मुखसे सुना कि अपने पिता दक्षसे अपमानित होनेके कारण देवी सतीने प्राण त्याग दिये हैं और उसकी यज्ञवेदीसे प्रकट हुए ऋभुओंने उनके पार्षदोंकी सेनाको मारकर भगा दिया है, तब उन्हें बड़ा ही क्रोध हुआ॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 424) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1317 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नर-मुण्डोंकी → नरमुण्डोंकी