श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तेऽपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम्।

हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययुः॥ २४

te'pi tanmukhaniryātaṃ yaśo lokamalāpaham|

harerniśamya tatpādaṃ dhyāyantastadgatiṃ yayuḥ|| 24

अर्थ

प्रचेतागण भी उनके मुखसे सम्पूर्ण जगत‍्के पापरूपी मलको दूर करनेवाले भगवच्चरित्र सुनकर भगवान्‌के चरणकमलोंका ही चिन्तन करने लगे और अन्तमें भगवद्धामको प्राप्त हुए॥ २४॥

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