श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्ट्या येन केन वा।

सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दनः॥ १९

dayayā sarvabhūteṣu santuṣṭyā yena kena vā|

sarvendriyopaśāntyā ca tuṣyatyāśu janārdanaḥ|| 19

अर्थ

वे भक्तवत्सल भगवान् समस्त जीवोंपर दया करनेसे, जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेसे तथा समस्त इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके शान्त करनेसे शीघ्र ही प्रसन्‍न हो जाते हैं ॥ १९॥✎ 1350

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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