श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

किं जन्म२भिस्त्रिभिर्वेह शौक्३लसावित्रयाज्ञिकैः।

कर्मभिर्वा त्रयीप्रोक्तैः पुंसोऽपि विबुधायुषा॥ १०

kiṃ janmabhistribhirveha śauklasāvitrayājñikaiḥ|

karmabhirvā trayīproktaiḥ puṃso'pi vibudhāyuṣā|| 10

अर्थ

जिनके द्वारा अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाले श्रीहरिको प्राप्त न किया जाय, उन माता-पिताकी पवित्रतासे, यज्ञोपवीत-संस्कारसे एवं यज्ञदीक्षासे प्राप्त होनेवाले उन तीन प्रकारके श्रेष्ठ जन्मोंसे, वेदोक्त कर्मोंसे, देवताओंके समान दीर्घ आयुसे, शास्त्रज्ञानसे, तपसे, वाणीकी चतुराईसे, अनेक प्रकारकी बातें याद रखनेकी शक्तिसे, तीव्र बुद्धिसे, बलसे, इन्द्रियोंकी पटुतासे, योगसे, सांख्य (आत्मानात्मविवेक)-से, संन्यास और वेदाध्ययनसे तथा व्रत-वैराग्यादि अन्य कल्याण-साधनोंसे भी पुरुषका क्या लाभ है?॥ १०—१२॥✎ 427

यह अर्थ श्लोक 10–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—भिस्त्रिभिर्वेदैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 571)
  2. ३

    प्रा० पा०—शुक्लसा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 571)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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