श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

यो जायमानः सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा।

स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन्॥ ५०

yo jāyamānaḥ sarveṣāṃ tejastejasvināṃ rucā|

svayopādatta dākṣyācca karmaṇāṃ dakṣamabruvan|| 50

अर्थ

इन्होंने जन्म लेते ही अपनी कान्तिसे समस्त तेजस्वियोंका तेज छीन लिया। ये कर्म करनेमें बड़े दक्ष (कुशल) थे, इसीसे इनका नाम ‘दक्ष’ हुआ॥ ५०॥✎ 424 425 1349

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #424 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #425 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1349 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीहरि-की → श्रीहरिकी

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