आपके वे भक्तजन तीर्थोंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर पैदल ही विचरते रहते हैं। भला, उनका समागम संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंको कैसे रुचिकर न होगा॥ ३७॥✎ 4231348
तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया।
भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः॥ ३७
आपके वे भक्तजन तीर्थोंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर पैदल ही विचरते रहते हैं। भला, उनका समागम संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंको कैसे रुचिकर न होगा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 568) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)