श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

गृहेष्वाविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम्।

मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मताः॥ १९

gṛheṣvāviśatāṃ cāpi puṃsāṃ kuśalakarmaṇām|

madvārtāyātayāmānāṃ na bandhāya gṛhā matāḥ|| 19

अर्थ

जिन लोगोंके कर्म भगवदर्पणबुद्धिसे होते हैं और जिनका सारा समय मेरी कथावार्ताओंमें ही बीतता है, वे गृहस्थाश्रममें रहें तो भी घर उनके बन्धनका कारण नहीं होते॥ १९॥✎ 1915

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1915 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ज्ञान-स्वरूप → ज्ञानस्वरूप

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