॥ श्रीहरिः ॥
अथ मय्यनपायिन्या भक्त्या पक्वगुणाशयाः।
उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्य निरयादतः॥ १८
atha mayyanapāyinyā bhaktyā pakvaguṇāśayāḥ|
upayāsyatha maddhāma nirvidya nirayādataḥ|| 18
अर्थ
अन्तमें मेरी अविचल भक्तिसे हृदयका समस्त वासनारूप मल दग्ध हो जानेपर तुम इस लोक तथा परलोकके नरकतुल्य भोगोंसे उपरत होकर मेरे परमधामको जाओगे॥ १८॥✎ 1915
अथ मय्यनपायिन्या भक्त्या पक्वगुणाशयाः।
उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्य निरयादतः॥ १८
अन्तमें मेरी अविचल भक्तिसे हृदयका समस्त वासनारूप मल दग्ध हो जानेपर तुम इस लोक तथा परलोकके नरकतुल्य भोगोंसे उपरत होकर मेरे परमधामको जाओगे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1915 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ज्ञान-स्वरूप → ज्ञानस्वरूप