श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अथ मय्यनपायिन्या भक्‍त्या पक्‍वगुणाशयाः।

उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्य निरयादतः॥ १८

atha mayyanapāyinyā bhaktyā pakvaguṇāśayāḥ|

upayāsyatha maddhāma nirvidya nirayādataḥ|| 18

अर्थ

अन्तमें मेरी अविचल भक्तिसे हृदयका समस्त वासनारूप मल दग्ध हो जानेपर तुम इस लोक तथा परलोकके नरकतुल्य भोगोंसे उपरत होकर मेरे परमधामको जाओगे॥ १८॥✎ 1915

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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