श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तथारिभिर्न व्यथते शिलीमुखैः

शेतेऽर्दितांगो हृदयेन दूयता।

स्वानां यथा वक्रधियां दुरुक्तिभि-

र्दिवानिशं तप्यति मर्मताडितः॥ १९

tathāribhirna vyathate śilīmukhaiḥ

śete'rditāṃgo hṛdayena dūyatā|

svānāṃ yathā vakradhiyāṃ duruktibhi-

rdivāniśaṃ tapyati marmatāḍitaḥ|| 19

अर्थ

देवि! शत्रुओंके बाणोंसे बिंध जानेपर भी ऐसी व्यथा नहीं होती, जैसी अपने कुटिलबुद्धि स्वजनोंके कुटिल वचनोंसे होती है। क्योंकि बाणोंसे शरीर छिन्‍न-भिन्‍न हो जानेपर तो जैसे-तैसे निद्रा आ जाती है, किन्तु कुवाक्योंसे मर्मस्थान विद्ध हो जानेपर तो मनुष्य हृदयकी पीड़ासे दिन-रात बेचैन रहता है॥ १९॥

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