॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.3.19
तथारिभिर्न व्यथते शिलीमुखैः
शेतेऽर्दितांगो हृदयेन दूयता।
स्वानां यथा वक्रधियां दुरुक्तिभि-
र्दिवानिशं तप्यति मर्मताडितः॥ १९
tathāribhirna vyathate śilīmukhaiḥ
śete'rditāṃgo hṛdayena dūyatā|
svānāṃ yathā vakradhiyāṃ duruktibhi-
rdivāniśaṃ tapyati marmatāḍitaḥ|| 19
अर्थ
देवि! शत्रुओंके बाणोंसे बिंध जानेपर भी ऐसी व्यथा नहीं होती, जैसी अपने कुटिलबुद्धि स्वजनोंके कुटिल वचनोंसे होती है। क्योंकि बाणोंसे शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेपर तो जैसे-तैसे निद्रा आ जाती है, किन्तु कुवाक्योंसे मर्मस्थान विद्ध हो जानेपर तो मनुष्य हृदयकी पीड़ासे दिन-रात बेचैन रहता है॥ १९॥