॥ श्रीहरिः ॥
तत्रैकाग्रमना वीरो गोविन्दचरणाम्बुजम्।
विमुक्तसंगोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात्॥ ८२
tatraikāgramanā vīro govindacaraṇāmbujam|
vimuktasaṃgo'nubhajan bhaktyā tatsāmyatāmagāt|| 82
अर्थ
वहाँ उन वीरवरने समस्त विषयोंकी आसक्ति छोड़ एकाग्र मनसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए सारूप्यपद प्राप्त किया॥ ८२॥
तत्रैकाग्रमना वीरो गोविन्दचरणाम्बुजम्।
विमुक्तसंगोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात्॥ ८२
वहाँ उन वीरवरने समस्त विषयोंकी आसक्ति छोड़ एकाग्र मनसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए सारूप्यपद प्राप्त किया॥ ८२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.82 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 563) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/82/