श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदाविति।

द्वे द्वे द्वारौ बहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः॥ ८

akṣiṇī nāsike karṇau mukhaṃ śiśnagudāviti|

dve dve dvārau bahiryāti yastadindriyasaṃyutaḥ|| 8

अर्थ

उस नगरमें जो एक-एक स्थानपर दो-दो द्वार बताये गये थे—वे दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और दो कर्णछिद्र हैं। इनके साथ मुख, लिंग और गुदा—ये तीन और मिलाकर कुल नौ द्वार हैं; इन्हींमें होकर वह जीव इन्द्रियोंके साथ बाह्य विषयोंमें जाता है॥ ८॥

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