श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.68

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः।

आयान्ति वर्गशो२ यान्ति सर्वे समनसो जनाः॥ ६८

sarve kramānurodhena manasīndriyagocarāḥ|

āyānti vargaśo yānti sarve samanaso janāḥ|| 68

अर्थ

मनके सामने इन्द्रियोंसे अनुभव होनेयोग्य पदार्थ ही भोगरूपमें बार-बार आते हैं और भोग समाप्त होनेपर चले जाते हैं; ऐसा कोई पदार्थ नहीं आता, जिसका इन्द्रियोंसे अनुभव ही न हो सके। इसका कारण यही है कि सब जीव मनसहित हैं॥ ६८॥✎ 421

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—बहुशो।

    (मुद्रित पृष्ठ 561)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #421 शब्दोंके बीचका स्थान: देश,काल → देश, काल

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