श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.67

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अदृष्टमश्रुतं चात्र क्‍वचिन्मनसि दृश्यते।

यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम्१॥ ६७

adṛṣṭamaśrutaṃ cātra kvacinmanasi dṛśyate|

yathā tathānumantavyaṃ deśakālakriyāśrayam|| 67

अर्थ

कभी-कभी स्वप्नमें देश, काल अथवा क्रियासम्बन्धी ऐसी बातें भी देखी जाती हैं, जो पहले कभी देखी या सुनी नहीं गयीं (जैसे पर्वतकी चोटीपर समुद्र, दिनमें तारे अथवा अपना सिर कटा दिखायी देना, इत्यादि)। इनके दीखनेमें निद्रादोषको ही कारण मानना चाहिये॥ ६७॥✎ 421

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—बलाश्रयम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 561)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #421 शब्दोंके बीचका स्थान: देश,काल → देश, काल

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