श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.60

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नारद उवाच

येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान्।

भुङ्क्ते ह्यव्यवधानेन लिंगेन मनसा स्वयम्॥ ६०

yenaivārabhate karma tenaivāmutra tatpumān|

bhuṅkte hyavyavadhānena liṃgena manasā svayam|| 60

अर्थ

श्रीनारदजीने कहा—राजन्! (स्थूल शरीर तो लिंगशरीरके अधीन है, अतः कर्मोंका उत्तरदायित्व उसीपर है) जिस मनःप्रधान लिंगशरीरकी सहायतासे मनुष्य कर्म करता है, वह तो मरनेके बाद भी उसके साथ रहता ही है; अतः वह परलोकमें अपरोक्षरूपसे स्वयं उसीके द्वारा उनका फल भोगता है॥ ६०॥

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