श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह।

कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते॥ ५९

iti vedavidāṃ vādaḥ śrūyate tatra tatra ha|

karma yatkriyate proktaṃ parokṣaṃ na prakāśate|| 59

अर्थ

वेदवादियोंका कथन जगह-जगह सुना जाता है कि ‘पुरुष इस लोकमें जिसके द्वारा कर्म करता है, उस स्थूलशरीरको यहीं छोड़कर परलोकमें कर्मोंसे ही बने हुए दूसरी देहसे उनका फल भोगता है। किन्तु यह बात कैसे हो सकती है?’ (क्योंकि उन कर्मोंका कर्ता स्थूलशरीर तो यहीं नष्ट हो जाता है।) इसके सिवा जो-जो कर्म यहाँ किये जाते हैं, वे तो दूसरे ही क्षणमें अदृश्य हो जाते हैं; वे परलोकमें फल देनेके लिये किस प्रकार पुनः प्रकट हो सकते हैं?॥ ५८-५९॥

यह अर्थ श्लोक 58–59 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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