वह कभी तो सात्त्विक कर्मोंके द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मोंके द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकोंमें जाता है—जहाँ उसे तरह-तरहके कर्मोंका क्लेश उठाना पड़ता है—और कभी तमोगुणी कर्मोंके द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियोंमें जन्म लेता है॥ २८॥✎ 134513461347
शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति कर्हिचित्।
दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमः शोकोत्कटान् क्वचित्॥ २८
वह कभी तो सात्त्विक कर्मोंके द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मोंके द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकोंमें जाता है—जहाँ उसे तरह-तरहके कर्मोंका क्लेश उठाना पड़ता है—और कभी तमोगुणी कर्मोंके द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियोंमें जन्म लेता है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/28/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—ल्लोकान् प्राप्नोति।
(मुद्रित पृष्ठ 556)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
#1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
#1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें