श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति।

स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्‍वरः॥ २२

kālakanyā jarā sākṣāllokastāṃ nābhinandati|

svasāraṃ jagṛhe mṛtyuḥ kṣayāya yavaneśvaraḥ|| 22

अर्थ

वृद्धावस्था ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता। तब मृत्युरूप यवनराजने लोकका संहार करनेके लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया॥ २२॥

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