॥ श्रीहरिः ॥
आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाश्रुभिः।
स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा॥ ४७
ātmānaṃ śocatī dīnamabandhuṃ viklavāśrubhiḥ|
stanāvāsicya vipine susvaraṃ praruroda sā|| 47
अर्थ
उस बीहड़ वनमें अपनेको अकेली और दीन अवस्थामें देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओंकी धारासे स्तनोंको भिगोती हुई बड़े जोर-जोरसे रोने लगी॥ ४७॥
आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाश्रुभिः।
स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा॥ ४७
उस बीहड़ वनमें अपनेको अकेली और दीन अवस्थामें देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओंकी धारासे स्तनोंको भिगोती हुई बड़े जोर-जोरसे रोने लगी॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/47/