चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणोंमें गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडसे बिछुड़ी हुई मृगीके समान चित्तमें अत्यन्त व्याकुल हो गयी॥ ४६॥
यदा नोपलभेताङ्घ्रावूष्माणं पत्युरर्चती।
आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा॥ ४६
चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणोंमें गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडसे बिछुड़ी हुई मृगीके समान चित्तमें अत्यन्त व्याकुल हो गयी॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 550) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/28/46/