वह इतने दिनोंतक पांचाल देशके उस नगरमें अपने दूतोंद्वारा लाये हुए करको लेकर विषय-भोगोंमें मस्त रहता था। स्त्रीके वशीभूत रहनेके कारण इस अवश्यम्भावी भयका उसे पता ही न चला॥ १८॥
स एव पुर्यां मधुभुक् पंचालेषु स्वपार्षदैः।
उपनीतं बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम्॥ १८
वह इतने दिनोंतक पांचाल देशके उस नगरमें अपने दूतोंद्वारा लाये हुए करको लेकर विषय-भोगोंमें मस्त रहता था। स्त्रीके वशीभूत रहनेके कारण इस अवश्यम्भावी भयका उसे पता ही न चला॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 544) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/18/