श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तन्मे प्रसीद सुहृदः कृतकिल्बिषस्य

स्वैरं गतस्य मृगयां व्यसनातुरस्य।

का देवरं वशगतं कुसुमास्त्रवेग-

विस्रस्त पौंस्नमुशती न भजेत कृत्ये॥ २६

tanme prasīda suhṛdaḥ kṛtakilbiṣasya

svairaṃ gatasya mṛgayāṃ vyasanāturasya|

kā devaraṃ vaśagataṃ kusumāstravega-

visrasta pauṃsnamuśatī na bhajeta kṛtye|| 26

अर्थ

मैं व्यसनवश तुमसे बिना पूछे शिकार खेलने चला गया, इसलिये अवश्य अपराधी हूँ। फिर भी अपना समझकर तुम मुझपर प्रसन्‍न हो जाओ; कामदेवके विषम बाणोंसे अधीर होकर जो सर्वदा अपने अधीन रहता है, उस अपने प्रिय पतिको उचित कार्यके लिये भला कौन कामिनी स्वीकार नहीं करती॥ २६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥

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