॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.26.25
वक्त्रं न ते वितिलकं मलिनं विहर्षं
संरम्भभीममविमृष्टमपेतरागम् ।
पश्ये स्तनावपि शुचोपहतौ सुजातौ
बिम्बाधरं विगतकुङ्कुमपङ्करागम्॥ २५
vaktraṃ na te vitilakaṃ malinaṃ viharṣaṃ
saṃrambhabhīmamavimṛṣṭamapetarāgam |
paśye stanāvapi śucopahatau sujātau
bimbādharaṃ vigatakuṅkumapaṅkarāgam|| 25
अर्थ
प्रिये! मैंने आजतक तुम्हारा मुख कभी तिलकहीन, उदास, मुरझाया हुआ, क्रोधके कारण डरावना, कान्तिहीन और स्नेहशून्य नहीं देखा; और न कभी तुम्हारे सुन्दर स्तनोंको ही शोकाश्रुओंसे भीगा तथा बिम्बाफलसदृश अधरोंको स्निग्ध केसरकी लालीसे रहित देखा है॥ २५॥