सेवकको दिया हुआ स्वामीका दण्ड तो उसपर बड़ा अनुग्रह ही होता है। जो मूर्ख हैं, उन्हींको क्रोधके कारण अपने हितकारी स्वामीके किये हुए उस उपकारका पता नहीं चलता॥ २२॥
परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पितः।
बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षणः॥ २२
सेवकको दिया हुआ स्वामीका दण्ड तो उसपर बड़ा अनुग्रह ही होता है। जो मूर्ख हैं, उन्हींको क्रोधके कारण अपने हितकारी स्वामीके किये हुए उस उपकारका पता नहीं चलता॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 542) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/26/22/