श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

पुरंजन उवाच

नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्‍वराःशुभे।

कृतागस्स्वात्मसात्कृत्वा शिक्षादण्डं न युंजते॥ २१

nūnaṃ tvakṛtapuṇyāste bhṛtyā yeṣvīśvarāḥśubhe|

kṛtāgassvātmasātkṛtvā śikṣādaṇḍaṃ na yuṃjate|| 21

अर्थ

पुरंजन बोला—सुन्दरि! वे सेवक तो निश्‍चय ही बड़े अभागे हैं, जिनके अपराध करनेपर स्वामी उन्हें अपना समझकर शिक्षाके लिये उचित दण्ड नहीं देते॥ २१॥

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