॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.26.10
शशान् वराहान् महिषान् गवयान् रुरुशल्यकान्।
मेध्यानन्यांश्च विविधान् विनिघ्नन् श्रममध्यगात्॥ १०
śaśān varāhān mahiṣān gavayān ruruśalyakān|
medhyānanyāṃśca vividhān vinighnan śramamadhyagāt|| 10
अर्थ
इस प्रकार वहाँ खरगोश, सूअर, भैंसे, नीलगाय, कृष्णमृग, साही तथा और भी बहुत-से मेध्य पशुओंका वध करते-करते राजा पुरंजन बहुत थक गया॥ १०॥ तब वह भूख-प्याससे अत्यन्त शिथिल हो वनसे लौटकर राजमहलमें आया। वहाँ उसने यथायोग्य रीतिसे स्नान और भोजनसे निवृत्त हो, कुछ विश्राम करके थकान दूर की॥ ११॥ फिर गन्ध, चन्दन और माला आदिसे सुसज्जित हो सब अंगोंमें सुन्दर-सुन्दर आभूषण पहने। तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी॥ १२॥ वह भोजनादिसे तृप्त, हृदयमें आनन्दित, मदसे उन्मत्त और कामसे व्यथित होकर अपनी सुन्दरी भार्याको ढूँढ़ने लगा; किन्तु उसे वह कहीं भी दिखायी न दी॥ १३॥