श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्‍च ह।

क्षेम्यं१ वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद् गृहाश्रमः॥ ४०

pitṛdevarṣimartyānāṃ bhūtānāmātmanaśca ha|

kṣemyaṃ vadanti śaraṇaṃ bhave'smin yad gṛhāśramaḥ|| 40

अर्थ

महापुरुषोंका कथन है कि इस लोकमें पितर, देव, ऋषि, मनुष्य तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके और अपने भी कल्याणका आश्रय एकमात्र गृहस्थाश्रम ही है॥ ४०॥✎ 1336 1337

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—क्षेमं।

    (मुद्रित पृष्ठ 537)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें
  • #1337 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विषय-भोगों-की → विषय-भोगोंकी

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