श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम्।

समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीं कुण्डलश्रियम्॥ २२

sunāsāṃ sudatīṃ bālāṃ sukapolāṃ varānanām|

samavinyastakarṇābhyāṃ bibhratīṃ kuṇḍalaśriyam|| 22

अर्थ

उसकी नासिका, दन्तपंक्ति, कपोल और मुख बहुत सुन्दर थे। उसके समान कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे॥ २२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें