उसकी नासिका, दन्तपंक्ति, कपोल और मुख बहुत सुन्दर थे। उसके समान कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे॥ २२॥
सुनासां सुदतीं बालां सुकपोलां वराननाम्।
समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीं कुण्डलश्रियम्॥ २२
उसकी नासिका, दन्तपंक्ति, कपोल और मुख बहुत सुन्दर थे। उसके समान कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 535) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/25/22/