एक पाँच फनवाला साँप उसका द्वारपाल था, वही उसकी सब ओरसे रक्षा करता था। वह सुन्दरी भोली-भाली किशोरी थी और विवाहके लिये श्रेष्ठ-पुरुषकी खोजमें थी॥ २१॥
पंचशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वतः।
अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम्॥ २१
एक पाँच फनवाला साँप उसका द्वारपाल था, वही उसकी सब ओरसे रक्षा करता था। वह सुन्दरी भोली-भाली किशोरी थी और विवाहके लिये श्रेष्ठ-पुरुषकी खोजमें थी॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 535) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/21/