श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पंचशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वतः।

अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम्॥ २१

paṃcaśīrṣāhinā guptāṃ pratīhāreṇa sarvataḥ|

anveṣamāṇāmṛṣabhamaprauḍhāṃ kāmarūpiṇīm|| 21

अर्थ

एक पाँच फनवाला साँप उसका द्वारपाल था, वही उसकी सब ओरसे रक्षा करता था। वह सुन्दरी भोली-भाली किशोरी थी और विवाहके लिये श्रेष्ठ-पुरुषकी खोजमें थी॥ २१॥

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