श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

प्रवृत्ताय निवृत्ताय पितृदेवाय कर्मणे।

नमोऽधर्मविपाकाय मृत्यवे दुःखदाय च॥ ४१

pravṛttāya nivṛttāya pitṛdevāya karmaṇe|

namo'dharmavipākāya mṛtyave duḥkhadāya ca|| 41

अर्थ

आप पितृलोककी प्राप्ति करानेवाले प्रवृत्ति-कर्मरूप और देवलोककी प्राप्तिके साधन निवृत्ति-कर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्मके फलस्वरूप दुःखदायक मृत्यु हैं; आपको नमस्कार है॥ ४१॥✎ 1333 1334

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
  • #1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी

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