श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

स तान् प्रपन्‍नार्तिहरो भगवान्धर्मवत्सलः।

धर्मज्ञान् शीलसम्पन्‍नान् प्रीतः प्रीतानुवाच ह॥ २६

sa tān prapannārtiharo bhagavāndharmavatsalaḥ|

dharmajñān śīlasampannān prītaḥ prītānuvāca ha|| 26

अर्थ

तब शरणागतभयहारी धर्मवत्सल भगवान् शंकरने अपने दर्शनसे प्रसन्‍न हुए उन धर्मज्ञ और शीलसम्पन्‍न राजकुमारोंसे प्रसन्‍न होकर कहा॥ २६॥

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