श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.39

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अनुदिनमिदमादरेण शृण्वन्

पृथुचरितं प्रथयन् विमुक्तसंगः।

भगवति भवसिन्धुपोतपादे

स च निपुणां लभते रतिं मनुष्यः॥ ३९

anudinamidamādareṇa śṛṇvan

pṛthucaritaṃ prathayan vimuktasaṃgaḥ|

bhagavati bhavasindhupotapāde

sa ca nipuṇāṃ labhate ratiṃ manuṣyaḥ|| 39

अर्थ

जो पुरुष इस पृथु-चरितका प्रतिदिन आदरपूर्वक निष्कामभावसे श्रवण और कीर्तन करता है; उसका जिनके चरण संसारसागरको पार करनेके लिये नौकाके समान हैं, उन श्रीहरिमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है॥ ३९॥✎ 411

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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