श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

मुक्तान्यसंगो भगवत्यमलां भक्तिमुद्वहन्।

वैन्यस्य चरितं पुण्यं शृणुयाच्छ्रावयेत्पठेत्॥ ३७

muktānyasaṃgo bhagavatyamalāṃ bhaktimudvahan|

vainyasya caritaṃ puṇyaṃ śṛṇuyācchrāvayetpaṭhet|| 37

अर्थ

मनुष्यको चाहिये कि अन्य सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर भगवान्‌में विशुद्ध निष्काम भक्ति-भाव रखते हुए महाराज पृथुके इस निर्मल चरितको सुने, सुनावे और पढ़े॥ ३७॥✎ 411

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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