मनुष्यको चाहिये कि अन्य सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर भगवान्में विशुद्ध निष्काम भक्ति-भाव रखते हुए महाराज पृथुके इस निर्मल चरितको सुने, सुनावे और पढ़े॥ ३७॥✎ 411
मुक्तान्यसंगो भगवत्यमलां भक्तिमुद्वहन्।
वैन्यस्य चरितं पुण्यं शृणुयाच्छ्रावयेत्पठेत्॥ ३७
मनुष्यको चाहिये कि अन्य सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर भगवान्में विशुद्ध निष्काम भक्ति-भाव रखते हुए महाराज पृथुके इस निर्मल चरितको सुने, सुनावे और पढ़े॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 523) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में