श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

देव्य ऊचुः

अहो इयं वधूर्धन्या या चैव भूभुजां पतिम्।

सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीर्वधूरिव॥ २५

aho iyaṃ vadhūrdhanyā yā caiva bhūbhujāṃ patim|

sarvātmanā patiṃ bheje yajñeśaṃ śrīrvadhūriva|| 25

अर्थ

देवियोंने कहा—अहो! यह स्त्री धन्य है! इसने अपने पति राजराजेश्‍वर पृथुकी मन-वाणी-शरीरसे ठीक उसी प्रकार सेवा की है, जैसे श्रीलक्ष्मीजी यज्ञेश्‍वर भगवान् विष्णुकी करती हैं॥ २५॥

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