श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

निष्पादितश्‍च कार्त्स्न्येन भगवद्भिर्घृणालुभिः।

साधूच्छिष्टं हि मे सर्वमात्मना सह किं ददे॥ ४३

niṣpāditaśca kārtsnyena bhagavadbhirghṛṇālubhiḥ|

sādhūcchiṣṭaṃ hi me sarvamātmanā saha kiṃ dade|| 43

अर्थ

आपलोग बड़े ही दयालु हैं। जिस कार्यके लिये आपलोग पधारे थे, उसे आपलोगोंने अच्छी तरह सम्पन्‍न कर दिया। अब, इसके बदलेमें मैं आपलोगोंको क्या दूँ? मेरे पास तो शरीर और इसके साथ जो कुछ है, वह सब महापुरुषोंका ही प्रसाद है॥ ४३॥

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