श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

न कुर्यात्कर्हिचित्सङ्गं तमस्तीव्रं तितीरिषुः।

धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम्॥ ३४

na kuryātkarhicitsaṅgaṃ tamastīvraṃ titīriṣuḥ|

dharmārthakāmamokṣāṇāṃ yadatyantavighātakam|| 34

अर्थ

इसलिये जिसे अज्ञानान्धकारसे पार होनेकी इच्छा हो, उस पुरुषको विषयोंमें आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिमें बड़ी बाधक है॥ ३४॥

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